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शनिवार, 17 नवंबर 2007
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वो जो छुप जाते थे काबों में, सनमखानों में

आज कई रोज़ के बाद आपसे मुखातिब हूँ. पिछली बार हमने पढ़ी थी अठारहवीं सदी के अहमतरीन शायर 'सौदा' की एक खूबसूरत गज़ल. ‘सौदा’ साहब के बाद आ...

बुधवार, 24 अक्तूबर 2007
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मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' की एक गज़ल

आज पढ़ते हैं १८वीं सदी के मशहूर शायर मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' की एक गज़ल. 'सौदा' का नाम उन उस्ताद शायरों में शुमार किया जाता ...

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2007
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तेरा घर और मेरा जंगल - परवीन शाकिर

और आज बात करते हैं, पाकिस्तान की शायद सबसे मशहूर शायरा परवीन शाकिर की. परवीन की शायरी का केन्द्रीय विषय नारी ही रही है पर यह उनकी शायरी की ...

सोमवार, 24 सितंबर 2007
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मेरी पसंद की एक गज़ल

कुछ चीजें ऐसी होतीं हैं जो सीधे आपके दिल में उतर जातीं हैं. ये चीजें कब या कहाँ मिलेंगी, कोई नहीं जानता. ऐसे ही एक दिन टीवी पर एक गज़ल सुनाई ...

बुधवार, 5 सितंबर 2007
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कंक्रीट का जंगल

दूर जहाँ तक नज़र जाती है फैला हुआ अनंत आकाश जिसपर कुछ नजर आता है तो आग बरसाता सूरज यही सूरज कुछ समय पहले गैहूँ की बालियों में सोना उड़ेलता...

शुक्रवार, 31 अगस्त 2007
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बहुत तलाश किया तुझको

कुछ समय पहले एक वेबसाइट द्वारा आयोजित नज़्म-प्रतियोगिता में मेरी यह नज़्म जज़ों द्वारा सर्वाधिक पसंद की गयी. उम्मीद है कि आप को भी पसंद आयेगी: ...

शनिवार, 4 अगस्त 2007
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जाति की ज़ंग

जाति की ज़ंग एक खबर का शीर्षक था; साथ दिया गया चित्र खासा आकर्षक था। चित्र में कुछ युवक मिलकर राज्य परिवहन की बस जला रहे थे; होली का हुड़दंग ...

शुक्रवार, 13 जुलाई 2007
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पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है - मीना कुमारी

मोमिन की खूबसूरत गज़ल के बाद एक बार फिर मीना कुमारी की पुरखलिश शायरी की ओर रुख करते हैं। तनहाई और दर्द से दो-चार लोगों का वक्त किस तरह गुज़रता...

शनिवार, 7 जुलाई 2007
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असर उसको ज़रा नहीं होता - मोमिन खाँ ’मोमिन’

आज इस बज़्म में मैं १९वीं सदी के मशहूर शायर मोमिन खाँ ’मोमिन’ की एक गज़ल लेकर हाज़िर हुआ हूँ। मोमिन अपने ज़माने के उस्ताद शायरों में गिने जाते थ...

गुरुवार, 5 जुलाई 2007
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आबलापा कोई इस दश्त में आया होगा - मीना कुमारी

मीना कुमारी 'नाज़' नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. हिन्दुस्तान की इस हसीन अदाकारा ने अपनी बेमिसाल अदायगी के दम पर लोगों के दिल में...

सोमवार, 25 जून 2007
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मधुशाला: एक श्रद्धांजलि

कई साल पहले, मैंने अपने पाठ्यक्रम के बाहर, पहली बार कोई साहित्यिक पुस्तक पढ़ी थी; किताब थी - बच्चन जी की शायद सबसे लोकप्रिय कृति "मधुशा...

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रेत और धुआँ

मीलों तक फैली अनंत, सीमाहीन रेत जहाँ तक नजर जाती है नहीं दिखता कोई सहारा, कोई आशा जीवन की, अपनों के सान्निध्य की मन के भीतर भी फैलती जात...

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जिन्दगी में जिस भी दम

जिन्दगी में जिस भी दम, चाहा मिले फजा नई फिर कारवाँ का पता न था, थी सामने खला नई चाहा था तोड़ दूँ सभी, काँटे मैं सच की राह के बस इतने ही ...

 
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