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सोमवार, 25 जून 2007
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मधुशाला: एक श्रद्धांजलि

कई साल पहले, मैंने अपने पाठ्यक्रम के बाहर, पहली बार कोई साहित्यिक पुस्तक पढ़ी थी; किताब थी - बच्चन जी की शायद सबसे लोकप्रिय कृति "मधुशा...

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रेत और धुआँ

मीलों तक फैली अनंत, सीमाहीन रेत जहाँ तक नजर जाती है नहीं दिखता कोई सहारा, कोई आशा जीवन की, अपनों के सान्निध्य की मन के भीतर भी फैलती जात...

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जिन्दगी में जिस भी दम

जिन्दगी में जिस भी दम, चाहा मिले फजा नई फिर कारवाँ का पता न था, थी सामने खला नई चाहा था तोड़ दूँ सभी, काँटे मैं सच की राह के बस इतने ही ...

 
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