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सोमवार, 25 जून 2007

जिन्दगी में जिस भी दम

जिन्दगी में जिस भी दम, चाहा मिले फजा नई
फिर कारवाँ का पता न था, थी सामने खला नई

चाहा था तोड़ दूँ सभी, काँटे मैं सच की राह के
बस इतने ही कसूर पर, मुझे दी गई सजा नई

मैं चाहता था मौत से, छीन लाऊँ हयात को
अभी सोच भी सका न था, थी सामने कजा नई

इन्सानियत की लाश जो, सरे-राह देखी पड़ी हुई
तड़प के दिल ये कह उठा, मालिक मेरे जजा नई

ये 'अजय' निजामे-खत्म है, बदल दें इस निजाम को
इस वास्ते हमको खुदा, तेरी चाहिये रजा नई

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