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सोमवार, 25 जून 2007

रेत और धुआँ

मीलों तक फैली अनंत, सीमाहीन रेत
जहाँ तक नजर जाती है
नहीं दिखता कोई सहारा, कोई आशा
जीवन की, अपनों के सान्निध्य की
मन के भीतर भी फैलती जाती है
बाहर की अनंत नीरवता
ह्रदयाकाश में भर गया है धुँआ
अपना कहने को कोई है
तो सम्मुख खड़ा मूक सहचर
जो चाह कर भी भर नहीं सकता
भीतर फैलते खालीपन को
ऐसे में इस सूनेपन को
पल दो पल को ही सही
इस धुँए से भरने का प्रयास करता हूँ
जानते हुए भी इसके नगण्य अस्तित्व को
पर कुछ और दिखता भी तो नहीं
चारों ओर जीवन में फैला है-
सिर्फ रेत और धुँआ।

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