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शुक्रवार, 13 जुलाई 2007

पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है - मीना कुमारी

मोमिन की खूबसूरत गज़ल के बाद एक बार फिर मीना कुमारी की पुरखलिश शायरी की ओर रुख करते हैं। तनहाई और दर्द से दो-चार लोगों का वक्त किस तरह गुज़रता है, ये सभी जानते हैं। इसी आलम को एक बारगी आँखों के सामने लाती ये गज़ल, बरबस पढ़ने या सुनने वाले को बाँध लेती है। आप भी पढ़ कर देखिये:


पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है
रात खैरात की, सदके की सहर होती है

साँस भरने को तो जीना नहीं कहते यारब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है

जैसे जागी हुई आँखों में चुभें काँच के ख्वाब
रात इस तरह दीवानों की बसर होती है

गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है

एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती खुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है

दिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँ
बारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती है

काम आते हैं न आ सकते हैं बेज़ाँ अल्फ़ाज़
तर्ज़मा दर्द की खामोश नज़र होती है

5 टिप्पणियाँ:

  1. गम ही दुश्मन है मेरा गम ही को दिल ढूँढता है
    एक लम्हे की ज़ुदाई भी अगर होती है
    वाह! गजब विरोधाभास है भाई. और शायद यही ज़िंदगी भी है.

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  2. अजय भाई इस ग़ज़ल के ज़रिये शायरा मीनाकुमारी को याद करने के लिये साधुवाद.ग़ज़ल परिचय में मेरे ख़याल से पुरख़लिश के बजाय पुरकशिश होता जो ज़्यादा बेहतर होता..आप बेहतर जानते होंगे..ख़ाकसार तो उर्दू का मामूली सा विद्यार्थी है.हाँ ये ज़रूर कहना उचित होगा कि अदाकारा मीनाकुमारी ने बिला-वजह शायरा मीनाकुमारी को पोशीदा रखा.शायद वक्त को यही मंज़ूर होगा.मीनाकुमारी की आवाज़ में ग़ज़लों और नज़्मों का एलबम वाक़ई बेशक़ीमती अमानत है.इसी में टुकडे़ टुकड़े दिन बीता...धज्जी धज्जी रात मिली एक लाजवाब रचना है.

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  3. संजय जी,
    गज़ल-परिचय में पुरखलिश शब्द का इस्तेमाल मैंने उस दर्द के चलते किया था जो मीनाकुमारी जी की लगभग हर गज़ल में पूरी शिद्दत से उभर कर आया है. वैसे पुरकशिश तो उनकी हर गज़ल है ही.

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  4. मीना जी की शायरी पढाने के लिये शुक्रिया । मीना जी का दर्द उनकी
    शायरी की जान है ।

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  5. क्या यह अभिनेत्री मीना कुमारी की गजल है। यदि हां, तो यह मेरे लिए आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता का सबब है। बहरहाल, गजल वाकई बहुत खूबसूरत है। इस खूबसूरत गजल को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए बधाई।

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