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शुक्रवार, 31 अगस्त 2007

बहुत तलाश किया तुझको

कुछ समय पहले एक वेबसाइट द्वारा आयोजित नज़्म-प्रतियोगिता में मेरी यह नज़्म जज़ों द्वारा सर्वाधिक पसंद की गयी. उम्मीद है कि आप को भी पसंद आयेगी:

बहुत तलाश किया तुझको पर कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया

मैं ढूँढता था तुझको रंगों के दरीचों में
ज़मीने-दैर में,मस्ज़िद में औ कलीसों में
नहीं तेरा मगर इनमें कहीं निशाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया

फिर खोजता फिरा मैं, कुदरत के नज़ारों में
वादियों में, सहरा में, वीरान कोहसारों में
लेकिन तुझको मैंने, इनमें भी कहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया

हारकर मैं अपने घर की तरफ जब आया
मुफ़लिस के आँसुओं में,तेरा ही अक्स पाया
हँसते हुये चेहरों में, तुझको ही निहाँ पाया
झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया

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2 टिप्पणियाँ:

  1. फिर खोजता फिरा मैं, कुदरत के नज़ारों में
    वादियों में, सहरा में, वीरान कोहसारों में
    लेकिन तुझको मैंने, इनमें भी कहाँ पाया
    झाँका भीतर तो दिल के दरमियाँ पाया

    वाह!!! अजय जी दिल को छू ले नेवाली नज़्म है यह आपकी ..सूफी रचना सी.. बहुत पसंद आई मुझे .

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  2. ajay ji aap hamesha hi jab jab kalam uthate hain bhaut ghare tak chhap chodhte hain aap ye nazm bhaut hi pasand aayi

    aapko is nazm ke liye bhaut si badhayi

    उत्तर देंहटाएं

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