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बुधवार, 24 अक्तूबर 2007

मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' की एक गज़ल

आज पढ़ते हैं १८वीं सदी के मशहूर शायर मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' की एक गज़ल. 'सौदा' का नाम उन उस्ताद शायरों में शुमार किया जाता है जिन्होंने उर्दू शायरी को लोक-प्रिय बनाने में अहम भूमिका निभायी है. ये १८वीं सदी के पूर्वार्ध में पैदा हुये और 'मीर' के समकालीन थे. ज्ञात हो कि 'मीर' अपनी तल्ख-मिज़ाज़ी के लिये जाने जाते हैं और 'सौदा' से उनकी कभी नहीं बनी, फिर भी अपने ज़माने में जिन 'पौने तीन' शायरों को उन्होंने गिना था, उनमें खुद अपने अलावा 'सौदा' को भी एक मुकम्मल शायर माना था.


मकदूर नहीं उसकी तज़ल्ली के बयाँ का
जूँ-शमाँ सरापा हो अगर सर्फ़ ज़ुबाँ का

पर्दे को तअय्युन के दरे-दिल से उठा दे
खुलता है अभी पल में तिलिस्मात जहाँ का

टुक देख सनमखान-ए-इश्क आन के ऐ शैख!
जूँ-शम-ए-हरम रंग झलकता है बुताँ का

इस गुलशने-हस्ती में अज़ब दीद है लेकिन
जब चश्म खुले गुल की तो मौसम हो खिज़ाँ का

दिखलाइये ले जाके तुझे मिस्र के बाज़ार
लेकिन नहीं ख्वाहाँ कोई वाँ ज़िंसे-गिराँ का

'सौदा' जो कभी गोश से हिम्मत के सुने तू
मज़मून यही है जरसे-दिल की फ़ुगाँ का

हस्ती से अदम तक नफ़से-चंद की राह
दुनिया से गुज़रना सफ़र ऐसा है कहाँ का

3 टिप्पणियाँ:

  1. मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी 'सौदा' की गज़ल प्रस्तुत करने के लिये आभार. आनन्द आ गया पढ़कर.

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  2. उर्दू बहुत समझ में नहीं आयी। पर मिर्जा 'सौदा" से परिचय कराने को धन्यवाद।

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  3. कुछ अर्थ समझ में नहीं आये ।पर पढ कर अच्छा लगा।

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