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शनिवार, 17 नवंबर 2007

वो जो छुप जाते थे काबों में, सनमखानों में

आज कई रोज़ के बाद आपसे मुखातिब हूँ. पिछली बार हमने पढ़ी थी अठारहवीं सदी के अहमतरीन शायर 'सौदा' की एक खूबसूरत गज़ल. ‘सौदा’ साहब के बाद आइये आज पढ़ते हैं बीसवीं सदी के मशहूर शायर मख्दूम मोहिउद्दीन को. मख्दूम के सरमाये में एक तरफ तो उनके क्रांतिकारी सरोकारों से जुड़ी शायरी है तो दूसरी ओर एक बड़ा भाग इससे अलग खालिस रूमानी शायरी का भी है. उनकी कई रचनाओं (जैसे 'दो बदन प्यार की आग में जल गये, एक चंबेली के मंडवे तले', 'आपकी याद आती रही रात भर' और 'फिर छिड़ी रात बात फूलों की' आदि) ने हिन्दी फिल्मों में के ज़रिये भी लोगों के दिलों में जगह बनायी है. तो आइये आज पढ़ते हैं, उनकी ये गज़ल:

वो जो छुप जाते थे काबों में, सनमखानों में
उनको ला-ला के बिठाया गया दीवानों में

फ़स्ले-गुल होती थी क्या जश्ने-ज़ुनूँ होता था
आज कुछ भी नहीं होता है गुलिस्तानों में

आज तो तलखिये-दौराँ भी बहुत हल्की है
घोल दो हिज़्र की रातों को भी पैमानों में

आज तक तन्ज़े-मुहब्बत का असर बाकी है
कहकहे गूँजते फिरते हैं बियाबानों में

वस्ल है उनकी अदा, हिज़्र है उनका अन्दाज़
कौन सा रंग भरूँ इश्क के अफ़सानों में

शहर में धूम है इक शोला-नवा की 'मख्दूम'
तज़किरे रस्तों में, चर्चे हैं परीखानों में

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4 टिप्पणियाँ:

  1. गज़ब है भइया हम इंतज़ार कर रहे है और चीजों का

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  2. ये नहीं कहूँगा कि बहुत पसंद आई पर आपकी वजह से ये ग़ज़ल पढ़ने का मौका मिला इसके लिए धन्यवाद !

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