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रविवार, 16 मार्च 2008

औरत : आज सोचा तो आँसू भर आये (क़ैफ़ी आज़मी)

सुल्तानुलमदारिस में दाखिल होने के कुछ अर्से बाद ही कैफ़ी साहब ने वहाँ के छात्रों की एक कमेटी गठित की और अपनी कुछ माँगे व्यवस्था-समिति के सामने रखीं. माँगें न माने जाने की सूरत में हड़ताल की गई. यहीं कैफ़ी साहब की इन्कलाबी शायरी की शुरुआत हुई. कमेटी की मीटिंगों में वे अपनी नज़्में पढ़ कर सुनाते और अपने साथियों में जोश पैदा करते. ऐसी ही एक नज़्म अचानक वहाँ से गुजरते हुये उर्दू के मशहूर साहित्यकार अली अब्बास हुसैनी ने सुनी तो उन्होंने कैफ़ी को अपने घर बुला कर नज़्म की तारीफ़ की. उन्हीं के ज़रिये न केवल वह नज़्म दैनिक ’सरफ़राज़’ में छपी बल्कि उनकी हड़ताल के समर्थन में सम्पादकीय भी छपा. यहीं उनकी मुलाकात अलीसरदार ज़ाफ़री साहब से हुई. आखिरकार छात्र-कमेटी की माँगें मान लीं गईं और हड़ताल खत्म हुई लेकिन कैफ़ी साहब को सुल्तानुलमदारिस से निकाल दिया गया. इसके बाद भी प्राइवेट विद्यार्थी के तौर पर उन्होंने उर्दू, अरबी और फ़ारसी की पढ़ाई जारी रखी.
कुछ समय बाद लखनऊ छोड़ कर वे कानपुर आ गये. यहाँ उनकी पहचान मज़दूर-सभा के कार्यकर्ताओं से हुई जो उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी का साहित्य देने लगे. और लखनऊ में कांग्रेस की प्रभात-फेरियों और सत्याग्रहों में शामिल रहने वाले युवा कैफ़ी क्म्युनिज़्म की तरफ झुकते गये. महज़ २४ की उम्र में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गये थे. पार्टी के दिशा-निर्देशों के अनुसार यहाँ कैफ़ी साहब ने पूर्णकालिक मज़दूर के रूप में काम करना शुरू कर दिय़ा. कुछ समय बाद, तत्कालीन बंबई को कार्यक्षेत्र बनाने का आदेश मिलने पर वे वहाँ चले गये.
इस सबके साथ-साथ देश भर में हो रहे मुशायरों में भी वे बराबर शिरकत करते रहे. ऐसे ही एक मुशाइरे के दौरान हैदराबाद में उनकी मुलाकात शौकत से हुई और जल्द ही उन्होंने शादी कर ली. शौकत कैफ़ी थियेटर करतीं थीं. बंबई आकर उन्होंने ’पृथ्वी थियेटर’ में काम करना शुरू कर दिया. ये शौकत ही थीं जिनकी वजह से कैफ़ी पारिवारिक दायित्वों की बहुत अधिक परवाह किये बिना समर्पित होकर अपने सामाजिक कार्यों में लगे रह सके.
शौकत को समर्पित उनकी एक नज़्म देखें:

ऐसा झोंका भी इक आया था के दिल बुझने लगा
तूने इस हाल में भी मुझको संभाले रक्खा

कुछ अंधेरे जो मिरे दम से मिले थे मुझको
आफ़रीं तुझ को, के नाम उनका उजाले रक्खा

मेरे ये सज़्दे जो आवारा भी बदनाम भी हैं
अपनी चौखट पे सजा ले जो तिरे काम के हों

बात शौकत कैफ़ी की आई है तो आइये देखें कि कैफ़ी साहब ने औरत की अहमियत को क्या स्थान दिया है; उनकी मशहूर नज़्म ’औरत’ में:

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

कल्ब-ए-माहौल में लरज़ाँ शरर-ए-ज़ंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक रंग हैं आज
आबगीनों में तपां वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क हम आवाज़ व हमआहंग हैं आज
जिसमें जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

ज़िन्दगी जहद में है सब्र के काबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू कांपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है नक़्हत ख़म-ए-गेसू में नहीं
ज़न्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

गोशे-गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिये
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिये
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिये
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिये
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़स के खींचे हुये हल्क़ा-ए-अज़मत से निकल
क़ैद बन जाये मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तोड़ ये अज़्म शिकन दग़दग़ा-ए-पन्द भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वह सौगंध भी तोड़
तौक़ यह भी है ज़मर्रूद का गुल बन्द भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मरदान-ए-ख़िरदमन्द भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू फ़लातून व अरस्तू है तू ज़ोहरा परवीन
तेरे क़ब्ज़े में ग़रदूँ तेरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से ज़बीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि संभलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

इस नज़्म को आइये सुनते हैं खुद क़ैफ़ी साहब की आवाज़ में:

Aurat : Kaifi Azmi...


और हर बार की तरह अब सुनते हैं क़ैफ़ी साहब की लिखी एक खूबसूरत गज़ल जिसे 1970 में आई फिल्म ’हँसते ज़ख्म’ के लिये लता जी ने मदन मोहन जी के संगीत-निर्देशन में गाया था.

तो आइये सुनें ये ग़ज़ल


ग़ज़ल के बोल हैं:

आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए

हर कदम पर उधर मुड़ के देखा -२
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए
आज सोचा ...

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं -२
याद इतना भी कोई न आए
आज सोचा ...

रह गई ज़िंदगी दर्द बनके -२
दर्द दिल में छुपाए छुपाए

6 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत शुक्रिया पढ़वाने का. कहीं से कैफ़ी साहब की ये नज़्म मिल सके तो आभारी रहूँगा :

    "तुम परेशान न हो बाब-ए-करम वा न करो,
    और कुछ देर पुकारूँगा, चला जाऊँगा ...."

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  2. अजय कैफी जी को सुनाने और उनके बारे में बताने के लिये धन्यवाद।

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  3. कैफी साहब के बारे में अच्छी जानकारी दी है।

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  4. बहुत अच्छा लिखा और अच्छी जानकारी दी मित्र।
    आज सोचा तो आंसू भर आये बहुत मधुर लगता है।

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  5. Meetha socho
    Smart socho
    Accha socho
    Saccha socho
    Pyara socho
    muje pata hai ye tumhare liye jyada hai..........
    1 shortcut hai


    sidhe mere baare me socho.

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  6. Jazbaat Mere Kahin Kuchh Khoye Huye Se Hain
    Kahu Kaise Who Tumse Thoda Sharmaye Huye Se Hain
    Par Aaj Na Rok Saku Ga Jazbato Ko Main Apne
    Karte Hain Pyar Hum Tumhi Se Par Ghabraye Se Huye Hain...

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