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शुक्रवार, 21 मार्च 2008

होली के रंग

होली के पर्व की यह विशेषता है कि यह हर व्यक्ति को अपने में समेट लेता है और उसे कुछ समय के लिये दुनिया के हर ग़म और चिंता से दूर एक आनंद-लोक में खींच ले जाता है. तो आइये आज क़ैफ़ी की नज़्मों व ग़ज़लों की श्रंखला को थोड़ा रोककर हम भी इस की मस्ती में रंग जायें.
होली के संदर्भ में पढ़ी और सुनी पौराणिक कथाओं से अलग यदि इसके सामाजिक महत्व के बारे में विचार करें तो यह पर्व भारतीय समाज के संरचनात्मक संगठन के लिये अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है. हमारे जीवन-मूल्य हमें अपने परिवार और पड़ोस, गाँव आदि से बहुत गहरे तक जोड़े रखते हैं. रिश्तों की इस गर्माहट और जीवंतता को बनाये रखने में होली जैसे पर्व खासा योगदान देते हैं. व्यक्तिगत कुंठा व अहम को दरकिनार कर सबसे प्रेम पूर्वक व्यवहार करने का संदेश देता ये पर्व हमारे अनुशाषित सामाजिक आचरण के बीच एक उन्मुक्त समीर की तरह आता है.
इस पर्व से गीत व संगीत का बहुत गहरा संबंध है. हजारों गीत इस पर्व से जुड़े हुये हैं फिर चाहे बात लोकगीतों कि हो या फिल्मी गीतों की. भारत की लगभग हर भाषा में होली-गीतों की परंपरा रही है. कहीं फाग है तो कहीं रसिया. तो आइये शुरुआत करते हैं सुप्रसिद्ध भक्त-कवयित्री मीरा बाई के एक भजन से:

श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया

ऐसी तू रंग दे कि रंग नाहीं छूटे
धोबिया धोये चाहे सारी उमरिया

लाल न रंगाऊँ मैं हरी न रंगाऊँ
अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया

बिना रंगाये मैं घर नहीं जाऊँगी
बीत ही जाये चाहे सारी उमरिया

मीरा के प्रभु गिरधर नागर
प्रभु चरणन में लागी नजरिया

मीरा का ही लिखा एक और होली-भजन आप यहाँ सुन सकते हैं.

और अब मैं आपको अपने पैतृक गाँव में होली के अवसर पर गाये जाने वाला एक गीत पढ़ाता हूँ. वैसे तो इस गीत को होली पर गाये जाने का कोई विशेष औचित्य समझ नहीं आता. इसे एक पहेली कह सकते हैं, पर इसका अर्थ अब तक मुझे किसी ने नहीं बताया. आप भी कोशिश करें इसे बूझने की:

हमारो हो, इतनो करि काम हमारो - २

कान-सराई और गिंजाई की बारी बनवा देना
मगरमच्छ का हँसला झूमै, चंद्रमा जड़वा देना
काँतर की मोइ नथ गढ़वाय दै, जामे लटकै बिच्छू कारो हो
इतनो करि काम हमारो

अंबर की मोइ फरिया लाय दै, बिजुरी कोर धरा देना
जितने तारे हैं अंबर में, उतने नग जड़वा देना
धरती को पट करों घाघरो, शेषनाग को नारो हो
इतनो करि काम हमारो

छत के ऊपर अट्टे के नीचे, चौमहला बनवा देना
बिन पाटी और बिन सेरये के, पचरंग पलँग नवा देना
दिन में जापै बूढ़ो सोवै, राति कों है जाइ बारो हो
इतनो करि काम हमारो

ऐसे कई गीत या भजन हैं पर मुझे सिर्फ़ यही कुछ हद तक याद है. आप को भी ऐसी कोई चीज याद हो तो बतायें. इसके बाद बारी है मेरे पसंदीदा फिल्मी होली गीत की, तो आइये सुनें ये गीत फिल्म ’मदर इंडिया’ से.

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और आखिर में सिलसिला ’रंग बरसे’ का:



चलते-चलते आप यदि चाहें तो एक बार होली को अपने शब्दों में बयाँ करने की मेरी कोशिश यहाँ भी देख सकते हैं. तो अगली बार मिलते हैं, एक बार फिर क़ैफ़ी के साथ.

5 टिप्पणियाँ:

  1. अजय भाई. पूरा मस्त कर दिया है इस गीत ने तो. जाने कितने ही गीत बने अपनी फिल्मों में होली के, लेकिन ये "मदर इंडिया" का गीत मेरे लिए तो आज तक का हिन्दी फिल्मों का होली का सब से उम्दा गीत है. एक और गीत फ़िल्म "नवरंग" का " अरे जा रे हट नटखट " भी मुझे बहुत पसंद है .. वो भी आज यहीं चिट्ठाजगत पे सुनने को मिल गया.

    होली बहुत बहुत मुबारक़ आप को.

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  2. वाह बहुत सुन्दर!!
    अजय जी आपको भी होली की शुभकामनायें...

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  3. Muje Nahi Chahiye Pura Sagar..
    Pani ki 1 bund hi kafi he..

    Muje Nahi Chahiye Hazaro Ladkiya..
    Bas 1 sachi Lvr hi kafi he..>D

    kya tum vahi ho?

    उत्तर देंहटाएं
  4. Ye Wada Hai Hamara
    Na Chhodenge Kabhi Saath Apka
    Jo Chhod Gaye Aap Hamein Bhool Kar
    Le Aayenge Pakar Kar Hath Aapka...

    उत्तर देंहटाएं

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